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Sunday, February 03, 2008

कृष्ण की चेतावनी

Today I got a very good Hindi poem as a forward - 'Madhushala' by Harivansh Rai Bachchan (for the uninitiated - that's Big B's father). It was fun to read the poem after so many years. You can read it here. That in-turn reminded me of school and of my favourite poem in school - 'Krishna kee chetavani' by Ramdhari Singh 'Dinkar'. But I could not find the poem on the net.

Some research revealed that it was actually not a poem but was created by pulling out parts of a much longer poem called Rashmirathi. I and another friend had memorized the poem in school and tried to remember it. To my utter disbelief, I could recollect most of it!! So I wrote down what I remembered. Some more serious search helped me find something - scanned images of most pages of Rashmirathi. It was diffucult to find the part (Krishna kee chetavani) in it but finally I got it, and that helped me correct errors in the what I wrote.

Thanks to Google's indic transliterator, the whole thing could be converted to Hindi fairly easily. Here it is:
कृष्ण की चेतावनी

वर्षों तक वन मी घूम-घूम, बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,
सह धुप-धाम पानी-पत्थर, पांडव आए कुछ और निखर,
सौभाग्य न सब दिन होता है,
देखे आगे क्या होता है I

मैत्री की राह बताने को, सबको सुमार्ग पर लाने को,
दुर्योधन को समझाने को, भीषण विध्वंस बचने को,
भगवन हस्तिनापुर आए,
पांडव को संदेशा लाये I

'दो न्याय अगर टू आधा दो, पर, उसमे भी यदि बढ़ा हो,
तो दे दो केवल पाँच ग्राम, रखो अपनी धरती तमाम,
हम वहीं खुशी से खाएँगे,
परिजन पर असि न उठाएँगे' I

दुर्योधन वह भी दे न सका, आशीष समाज की ले न सका,
उल्टे, हरि को बांधने चला, जो था असाध्य, साधने चला,
जब नाश मनुज पर छाता है,
पहले विवेक मर जाता है I

हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप विस्तार किया,
डगमग-डगमग दिग्गज डोले, भगवन कुपित हो कर बोले -
'ज़ंजीर बढ़ा आ साध मुझे,
हाँ हाँ दुर्योधन बाँध मुझे' I

'हित-वचन नही तूने माना, मैत्री का मूल्य न पहचाना,
तो ले अब मैं भी जाता हूँ, अंतिम संकल्प सुनाता हूँ,
याचना नही अब रण होगा,
जीवन जय या की मरण होगा' I

'टकराएंगे नक्षत्र निखर, बरसेगी भू पर वह्नी प्रखर,
फन शेषनाग का दोलेगा, विकराल काल मुह खोलेगा,
दुर्योधन रण ऐसा होगा,
फ़िर कभी नही जैसा होगा' I

'भाई पर भाई टूटेंगे, विष बाण बूँद से छूटेंगे,
वायस श्रुगाल सुख लूटेंगे, सौभाग्य मनुज के फूटेंगे,
आख़िर तू भूशायी होगा,
हिंसा का पर दाई होगा' I

थी सभा सन्न, सब लोग डरे, चुप थे या थे बेहोश खड़े,
केवल दो नर न अघाते थे, ध्रिथ्राष्ट्र विधुर सुख पते थे,
कर जोड़ खड़े प्रमुदित निर्भय,
दोनों पुकारते थे जय-जय I

I hope you liked it! And please let me know if there are any mistakes.

1 comment:

Anonymous said...

wow.. this reminded me of old times... i didnt remember the whole poem, but a lot of lines were familiar!!!

-kaddy